Thursday, August 28, 2025

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

बड़ी तन्मयता से देखा था तुमने मुझे,
और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि—
आख़िर ये क्या है?

किस पल तुम्हें लगा कि मेरा कंधा
तुम्हारे सिर को टिकाने,
तुम्हारे आँसुओं को सोखने
और तुम्हें सहारा देने के लिए सबसे उपयुक्त जगह है?

थोड़ी देर के लिए तो मैं मान भी सकता हूँ,
मगर पूरी ज़िन्दगी के लिए?
ये निर्णय कुछ अजीब सा है।

क्योंकि सच कहूँ तो
मेरे भीतर लेशमात्र भी सहनशीलता नहीं है।
तुम्हें मैं तुनकमिज़ाज लग सकता हूँ,
या शायद निरंकुश विचारों वाला।

कारण कोई विशेष नहीं—
बस मेरे अंतर्मन में मैं स्वयं ही नहीं रहता,
तो तुम्हें कैसे बसाऊँ?

असल में मैं मन की चालों से परेशान हो चुका हूँ।
वह हर बार पराजय को सहजता से स्वीकार कर लेता है,
मानो उसे अपने ही विनाश में आनंद आता हो।

अतीत के कटु अनुभवों ने
मेरे विचारों की रीढ़ तोड़ दी है।
अब बहुत कुछ वैसा नहीं रहा
जैसा पहले था।

कभी सोचता हूँ—
क्या यह प्रेम है,
या केवल वासनाओं का जाल?

मेरे भीतर एक विषैली अशांति है
जो हर दिन मेरे विकारों को और भड़काती रही।
कामना के गर्त में गिरकर
केवल शरीर ही नहीं,
आत्मा भी क्षीण हो गई थी।

अब जाकर
मैंने अपने मन पर थोड़ा-सा अधिकार पाया है,
और ऐसे में तुम
मुझे फिर उसी बंधन में खींचना चाहती हो।

तुम नहीं जानती—
मेरा क्रोध तीक्ष्ण है,
पर उतना ही खोखला भी।
वह दुर्बलों पर प्रकट होता है,
और शक्ति के सामने
भय में बदल जाता है।

क्या तुम चाहती हो कि
मैं अपनी क्रोधाग्नि से
तुम्हारी इच्छाओं को शांत करूँ?

यदि ऐसा हुआ—
तो केवल हमारे शरीर ही नहीं,
हमारा मन,
हमारा अस्तित्व,
और सबसे बढ़कर
हमारा स्वाभिमान भी क्षत-विक्षत हो जाएगा।

मुझे तुमसे कोई लोभ नहीं,
केवल एक सहानुभूति है—
जो शायद जीवन पर्यन्त बनी रहे।
मृत्यु के बाद क्या होगा,
मुझे नहीं ज्ञात।

इस भ्रम में मत रहना
कि तुम्हारी बातों को सुन लेना
तुम्हारे प्रेम को स्वीकार कर लेना है।
यह केवल तुम्हारा भ्रम है।

तुम प्रेम में नहीं—
मोह में बँध रही हो।
शायद यह तुम्हारा आकर्षण है,
या तुम्हारी अधूरी इच्छाएँ
जो तुम्हें मेरी ओर खींच रही हैं।

लेकिन ऐसा मत करो।

यह मत समझना कि
मैं अपने एकांत, अपने व्यक्तित्व
या अपनी दार्शनिकता के मद में बोल रहा हूँ।
मेरा अभिमान तो उसी दिन गिर गया था
जब मैंने अपने विकारों को स्वीकार किया
और प्रायश्चित का मार्ग चुना।

मैं अपने अतीत को नहीं बदल सकता,
लेकिन वर्तमान को खोना भी नहीं चाहता।

शायद तुम ईर्ष्या और मोह के
एक मायाजाल में उलझ रही हो।
मैंने तुम्हें अपने सभी विकारों से परिचित करा दिया है।

अब तुम्हें ही निर्णय लेना है—
उन्हें पोषित करना है
या उनका अंत करना है।

मेरी मानो—
आत्ममंथन करो।

तुम्हें मेरे कंधे की नहीं,
अपने मन के विकारों की मृत्यु ही सहारा देगी।

इसलिए अपनी आशा को यहीं विराम दो—

क्योंकि
तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं।


 ---राजेश बलूनी प्रतिबिम्ब 

Wednesday, August 20, 2025

ख़्वाबों का क्या?














"ओह!" समाज कहता है—

सीधा-सादा जीयो,
ना रोमांच, ना जद्दोजहद,
ना कोई पागलपन लिए हो।

सिर्फ चलो उसी डगर पे
जहाँ सब चलते हैं,
ना सवाल उठाओ,
ना सपनों में पलते हैं।

लेकिन… फिर कैसे जिऊँ
वो ज़िन्दगी,
जहाँ हो जज़्बा,
जहाँ हो बंदगी?

आजकल तो हाल ये है—
सुबह देर से उठता हूँ,
नहा-धोकर ऑफिस भागता हूँ।
डेस्क पर बैठा
वही पुराने काम दोहराता हूँ।

ना नया कोई ख्वाब,
ना रचनात्मकता की आवाज़।
बस जैसे मशीन,
या कहो—खोखली किताब।

अरे! कैसी ये ज़िन्दगी,
ना लक्ष्य, ना उम्मीद,
सूअर-सी खपत,
कीड़े-सी रफ़्तार—


और आख़िर में?
बस ख़त्म—
बिना कोई निशान छोड़े,
बिना कोई चिंगारी जले।

— राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Friday, October 11, 2024

आज उन्मुक्त हो गया......














आज उन्मुक्त हो गया स्वार्थ बंधनों से 

वो झूठ, दगाबाजी और मक्कारी की कहानी 

जिसका कभी मैं हिस्सा था 

आज उन सभी निषेधात्मक विचारों, 

प्रवृतियों और अपमानो के सर्पदंशो से मुक्ति मिल गयी है |

बहुत लांछन लगाए, कितने असत्य वाक्य कहे 

मेरा  विरोध करने के लिए अपने चरित्र का व्यापार भी  किया 

मगर मैं सत्य के मार्ग में अडिग रहा , 

नहीं नहीं मैं अपनी आत्म अनुशंसा नहीं कर रहा हूँ 

मैं तो मुझ पर किये हुए तुम्हारे अत्याचारों का बखान कर रहा हूँ 

मगर संभवतः तुम्हे इस से कोई फर्क न पड़े 

और अब मुझे भी तुमसे कोई सरोकार नहीं 

मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई द्वेष नहीं है, 

मगर अपने लिए पीड़ा है कि मैंने क्यों तुम्हारे दुराचरण का 

समय रहते विरोध नहीं किया , 

क्यों तुम्हारे प्राणघातक 

तुम्हारी आत्ममुग्धता ने 

मेरे अंदर के व्यक्तिव में इतना भय 

उत्पन्न कर लिया था ?

 क्या तुम्हारा उद्देश्य केवल 

मेरे मान और सामान को धत्ता बताना था या फिर 

तुम पहले से ही षड़यंत्र करके आई थी 

खैर अब जो भी हो, 

प्रभु की कृपा से मैं अब तुम्हारे मायाजाल ,

 मोहपाश और घृणित विचारों से स्वतंत्र हो चूका 

तुम्हे सद्बुद्धि मिले न मिले 

मगर मेरे मन को शांति अवश्य मिली है 


- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 




Friday, April 29, 2022

आत्मा का मरण

 











स्वप्न सम्भवतः सबसे पीड़ादायक है

वो आपके अंतरमन को छलनी कर देता है

मैं प्रेम पाश की मृग तृष्णा में अपने अस्तित्व का

विनाश कर रहा हूँ

कब तक यूँ ही संधि करूंगा

क्या मेरा आत्मसम्मान विकृत हो चुका  है , निर्लज्ज  हो चुका है

ये जीवित है भी कि नहीं! 

कब तक अपने स्वप्न की तिलांजलि दूँ

कब तक अपने विचारों को मारूं

मैं अपनी प्रवृति को तुम्हारे साथ नहीं मिला सकता

मैंने बहुत विचार किया ,

लेकिन अब समायोजन करने की पराकाष्ठा हो चुकी है

अब और नहीं , कदापि नहीं

अब या तो विचारों का छरण होगा या फिर आत्मा का मरण होगा 


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '

Friday, November 26, 2021

किंकर्तव्यविमूढ़

मार्ग में चल रहे हैं मगर लक्ष्य क्या है पता नहीं, 

मन की आंखें नेत्रहीन हो गई 

और जो आंखें बची है वो  दिशाहीन  हैं, 

प्रश्न व्यापक हैं मगर  उत्तर लघु हैं, 

खोजते हैं जीवन को मगर स्वयं में कुछ देखते नहीं,

 सारा दिन आलस्य की तन्द्रा में गुज़ारते हैं! 

अब तो कीट और पतंगे भी  हमारा  उपहास करते हैं ,

 क्योंकि हमारा जीवन उनसे भी निकृष्ट हो  गया है! 

उनको मारने वाले कीटनाशक हमारी नसों में घुल चुके हैं , 

भावनाएं तो मानव की वैसे भी विषधर थी 

मगर अब उसमे एक नवरंग चढ़ गया! 

साथ के सहपाठी और सहकर्मी नए-नए आयामों को छू कर आ गए

 और हम वहीँ कूपमंडूक से बैठें हैं ,

 बस कोसना , उलाहना और आलोचना करना आता है! 

परिश्रम करना नहीं आता ,

अपनी परिस्थितियों और असफलताओं  

केवल परिवेदना करना आता हैं , 

स्वयं के हृदय में झांकते भी नहीं , 

मगर दूसरों व्यक्तियों से ईर्ष्या होती है!

कहाँ है वो प्रकाश पुंज जहाँ मन के अँधेरे को 

एक बाती का कण भी प्रज्ज्वलित कर देता है , 

वह कहीं नहीं है मेरे भीतर है , 

बस सोया पड़ा है क्योंकि उसे केवल वाक्पटुता आती है , 

कर्म करना नहीं! 

ठीक है बनो अकर्मण्य, 

रह जाओगे फिर इसी धूसर में  

जिसे सब लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, 

हाँ अपने लिए एक बड़ा सा गड्ढा ज़रूर खोद देना ,

 ताकि लज्जा का अनुभव होने पर 

तुम अपना मुँह तो कहीं छुपा सको, 

तब तक निसंदेह सबकी गालियों का पात्र बने रहे

 क्योंकि तुम्हारी अभद्रता ही तुम्हारे जीवन की पराजय है! 

विफलता का कारण स्वयं तुम हो , 

कोई दूसरा या तीसरा नहीं है !

 रहो ऐसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ 

क्योंकि जीवन में स्पष्टता को तो 

तुमने सम्मिलित होने का अवसर ही नहीं दिया! 

रुग्ण तुम्हारा शरीर नहीं तुम्हारी  मानसिकता है , 

इसको परिवर्तित करो , 

अन्यथा जैसे इतिहास ने कायरों का मान मर्दन किया 

वैसे ही तुम्हारा भी किया जाएगा !

 हालाँकि इसकी सम्भावना ना के सामान है!

 क्योंकि सामर्थ्य कुछ नहीं है तुम में 

और तुम अनदेखा और तिरस्कृत करने के ही योग्य हो


-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Sunday, March 4, 2018

प्रपंच मंडली....



भूलवश समझता रहा कि मेरे पास
शुभचिंतकों का भण्डार है, संभवतः यह
मेरे जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है | कैसे एक व्यक्ति अपनी
तृष्णाओं और आकाँक्षाओं की पूर्ति के साधक खोजता है,
परिस्थितिवश वो व्यक्ति सहृदयता की नौटंकी करके स्वयं को
आपके प्रति आत्मीय सिद्ध करने का प्रयास करता है,
और इन्हे आधुनिक शब्दकोष
में मित्र की संज्ञा दी गई है| मित्र !
अरे कैसे मित्र हैं ये, जो स्वार्थ सिद्धि की चरम पराकाष्ठा को पार
करते हैं| क्या यही है इस समाज का निरर्थक और निर्लज्ज स्वरूप जो मात्र स्वहित
की परिधि तक सीमित है , इनका उद्देश्य सिर्फ सहानुभूति और धन की उगाही है,
यहाँ सामूहिक विचारों का सम्प्रेषण नहीं होता,
अपितु ये अपने बनाये हुए पूर्वाग्रह और
कुविचार आप पर लादते हैं|
ये स्वयं के अनुसार आपके जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं
तथा आपके दृष्टिकोण को नगण्य समझते हैं और
अपने निर्णयों का निरंकुशता से पालन करवाने की
महत्वकांक्षा रखते हैं, नेतृत्व करने की चाह रखते हैं,
परन्तु सहभागिता को अपने पास तक नहीं फटकने देते|
और तो और इतनी ईर्ष्या, इतना दम्भ और इतनी कृतघ्नता है
इनके भीतर कि स्वयं की आवश्यकता होने पर
एक याचक की भांति हाथ फैलाते हैं और आपका समय आने पर
मौन अवस्था और अस्वीकृति की मुद्रा में आ जाते हैं|
वहां अपने आपको असहाय दिखने का छद्म करते हैं|
परन्तु समय का प्रहार बड़ा ही कटु और पीड़ादायक होता है
और यदि यही धूर्तता की प्रवृति विद्यमान रही तो भविष्य में
किसी भी प्रकार की आशा करने वाले अपरिपक्व तथा लोभी
मानसिकता के लोगों के लिए  द्वार बंद हो जाते हैं |
सहयोग़, निष्ठा और समन्वय बहुत ही मूलयवान चरित्र हैं जीवन के,
और इस प्रपंच मंडली तथा अमित्र समूह से इसकी अपेक्षा करना बेमानी है|

-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Tuesday, December 19, 2017

परिचय



समय तुम बहुत तीक्ष्ण और निर्मम हो ,
संभवतः तुमने मेरी दिनचर्या और जीवन में असंख्य दंश दिए हैं,
 और इसका उत्तरदायी मैं स्वयं हूँ ,
अनंतकाल से अज्ञानता की काल कोठरी में मस्तिष्क परतंत्र हो चुका,
स्वतंत्रता क्या होती है इसका तनिक भी भान नहीं था ,
बस  अभिमान की एक  मोटी परत थी जो मानसिकता को भ्रष्ट कर रही थी|
विद्वेष और दम्भ ने चेहरे की त्योरियों को बढ़ा रखा था|
 ज्ञात नहीं कि कौन से गंतव्य की ओर मुड़ना है,  बस अनवरत किसी दिशाहीन यात्रा पर जा रहे हैं ,
संशय का सम्बल लेकर,
मेरा अर्ध ज्ञान तब मेरे व्यक्तित्व की तिलांजलि देता है  जब मैं मौन होकर भी विचलित रहता हूँ ,
ईर्ष्या का आविर्भाव ऐसे हुआ जैसे कोई गर्म चाय के केतली  मेरे केशरहित मुंड पर उड़ेल रहा हो!
कुविचार आया कि कैसे प्रतिक्षण प्रयास किया जाये जीवन की विलासिता को बढ़ाने वाले साधन यंत्रो से लैस होते रहें |
समय व्यतीत अपने समय में होता गया और मैं चिंता की कोठरी में कठोर शीत लहर का प्रहार झेल रहा हूँ ,
ये बयार हवाओं की नहीं अँधेरे की है ,
जीवन के अँधेरे की, निराशा के अँधेरे की!  कैसे पार पाउँगा ,
नैया तो पहले ही खर पतवार के खेतों में उलझ चुकी थी, वहां मरुभूमि ही थी,
कोई हरियाली नहीं थी|  क्यों! परिस्थितियों  तुम क्यों  नीरव अश्रुकण को बहाती हो ,
 आओ तुम भी आओ रणभूमि में बाण चलाने के लिए,   मुझे कोसने के लिए  ,
संभवतः मेरी पीड़ा के मधुर सोपान, कंटकों की क्यारियों में आश्रित है जिन्हे स्वयं मैंने बोया था कभी लालसा,
मद और अति महत्वाकांक्षा का उपधान लेकर!!!!!
विचारों का समागम अब तब होगा जब इस निर्दय शरीर का एक एक टुकड़ा अग्निकुंड में सम्माहित होगा ,
फिर किसी की सहानुभूति की दो बूँद भी मेरी आत्मा के निर्वाण के लिए पर्याप्त होगा ,
तब तक अनायास ही पश्चाताप की वेणी बजायेंगे, नहीं तो मंथन तो होगा ही!!!!

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

बड़ी तन्मयता से देखा था तुमने मुझे, और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि— आख़िर ये क्या है? किस पल तुम्हें लगा कि मेरा कंधा तुम्हारे सिर ...