"ओह!" समाज कहता है—
सीधा-सादा जीयो,
ना रोमांच, ना जद्दोजहद,
ना कोई पागलपन लिए हो।
सिर्फ चलो उसी डगर पे
जहाँ सब चलते हैं,
ना सवाल उठाओ,
ना सपनों में पलते हैं।
लेकिन… फिर कैसे जिऊँ
वो ज़िन्दगी,
जहाँ हो जज़्बा,
जहाँ हो बंदगी?
आजकल तो हाल ये है—
सुबह देर से उठता हूँ,
नहा-धोकर ऑफिस भागता हूँ।
डेस्क पर बैठा
वही पुराने काम दोहराता हूँ।
ना नया कोई ख्वाब,
ना रचनात्मकता की आवाज़।
बस जैसे मशीन,
या कहो—खोखली किताब।
अरे! कैसी ये ज़िन्दगी,
ना लक्ष्य, ना उम्मीद,
सूअर-सी खपत,
कीड़े-सी रफ़्तार—
और आख़िर में?
बस ख़त्म—
बिना कोई निशान छोड़े,
बिना कोई चिंगारी जले।
— राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

No comments:
Post a Comment