Thursday, August 28, 2025

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

 बड़ी तन्मयता देखा था तुमने मुझे


और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि 


आखिर ये क्या है !


आखिर कौन से पल तुम्हे लगा कि मेरा कन्धा 


तुम्हारे सिर को टिकाने, तुम्हारे आंसुओं को सोखने और 


तुम्हे सहारा देने के लिए सबसे उपयुक्त जगह है, 


थोड़ी देर के लिए तो मैं मान भी सकता हूँ, 


मगर पूरी ज़िन्दगी के लिए ? ये फैसला बहुत अजीब हो सकता है , 


क्योंकि तुम्हे सच बताऊं तो मेरे अंदर लेशमात्र भी सहनशीलता नहीं है , 


मैं संभवतः तुम्हे एक तुनकमिज़ाज व्यक्ति 


या फिर निरंकुश विचार लग सकता हूँ।


 कारण इसका कुछ विशेष नहीं है 

Wednesday, August 20, 2025

ख़्वाबों का क्या?














"ओह!" समाज कहता है—

सीधा-सादा जीयो,
ना रोमांच, ना जद्दोजहद,
ना कोई पागलपन लिए हो।

सिर्फ चलो उसी डगर पे
जहाँ सब चलते हैं,
ना सवाल उठाओ,
ना सपनों में पलते हैं।

लेकिन… फिर कैसे जिऊँ
वो ज़िन्दगी,
जहाँ हो जज़्बा,
जहाँ हो बंदगी?

आजकल तो हाल ये है—
सुबह देर से उठता हूँ,
नहा-धोकर ऑफिस भागता हूँ।
डेस्क पर बैठा
वही पुराने काम दोहराता हूँ।

ना नया कोई ख्वाब,
ना रचनात्मकता की आवाज़।
बस जैसे मशीन,
या कहो—खोखली किताब।

अरे! कैसी ये ज़िन्दगी,
ना लक्ष्य, ना उम्मीद,
सूअर-सी खपत,
कीड़े-सी रफ़्तार—


और आख़िर में?
बस ख़त्म—
बिना कोई निशान छोड़े,
बिना कोई चिंगारी जले।

— राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

 बड़ी तन्मयता देखा था तुमने मुझे और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि  आखिर ये क्या है ! आखिर कौन से पल तुम्हे लगा कि मेरा कन्धा  तुम्हारे सि...