Thursday, August 28, 2025

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

बड़ी तन्मयता से देखा था तुमने मुझे,
और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि—
आख़िर ये क्या है?

किस पल तुम्हें लगा कि मेरा कंधा
तुम्हारे सिर को टिकाने,
तुम्हारे आँसुओं को सोखने
और तुम्हें सहारा देने के लिए सबसे उपयुक्त जगह है?

थोड़ी देर के लिए तो मैं मान भी सकता हूँ,
मगर पूरी ज़िन्दगी के लिए?
ये निर्णय कुछ अजीब सा है।

क्योंकि सच कहूँ तो
मेरे भीतर लेशमात्र भी सहनशीलता नहीं है।
तुम्हें मैं तुनकमिज़ाज लग सकता हूँ,
या शायद निरंकुश विचारों वाला।

कारण कोई विशेष नहीं—
बस मेरे अंतर्मन में मैं स्वयं ही नहीं रहता,
तो तुम्हें कैसे बसाऊँ?

असल में मैं मन की चालों से परेशान हो चुका हूँ।
वह हर बार पराजय को सहजता से स्वीकार कर लेता है,
मानो उसे अपने ही विनाश में आनंद आता हो।

अतीत के कटु अनुभवों ने
मेरे विचारों की रीढ़ तोड़ दी है।
अब बहुत कुछ वैसा नहीं रहा
जैसा पहले था।

कभी सोचता हूँ—
क्या यह प्रेम है,
या केवल वासनाओं का जाल?

मेरे भीतर एक विषैली अशांति है
जो हर दिन मेरे विकारों को और भड़काती रही।
कामना के गर्त में गिरकर
केवल शरीर ही नहीं,
आत्मा भी क्षीण हो गई थी।

अब जाकर
मैंने अपने मन पर थोड़ा-सा अधिकार पाया है,
और ऐसे में तुम
मुझे फिर उसी बंधन में खींचना चाहती हो।

तुम नहीं जानती—
मेरा क्रोध तीक्ष्ण है,
पर उतना ही खोखला भी।
वह दुर्बलों पर प्रकट होता है,
और शक्ति के सामने
भय में बदल जाता है।

क्या तुम चाहती हो कि
मैं अपनी क्रोधाग्नि से
तुम्हारी इच्छाओं को शांत करूँ?

यदि ऐसा हुआ—
तो केवल हमारे शरीर ही नहीं,
हमारा मन,
हमारा अस्तित्व,
और सबसे बढ़कर
हमारा स्वाभिमान भी क्षत-विक्षत हो जाएगा।

मुझे तुमसे कोई लोभ नहीं,
केवल एक सहानुभूति है—
जो शायद जीवन पर्यन्त बनी रहे।
मृत्यु के बाद क्या होगा,
मुझे नहीं ज्ञात।

इस भ्रम में मत रहना
कि तुम्हारी बातों को सुन लेना
तुम्हारे प्रेम को स्वीकार कर लेना है।
यह केवल तुम्हारा भ्रम है।

तुम प्रेम में नहीं—
मोह में बँध रही हो।
शायद यह तुम्हारा आकर्षण है,
या तुम्हारी अधूरी इच्छाएँ
जो तुम्हें मेरी ओर खींच रही हैं।

लेकिन ऐसा मत करो।

यह मत समझना कि
मैं अपने एकांत, अपने व्यक्तित्व
या अपनी दार्शनिकता के मद में बोल रहा हूँ।
मेरा अभिमान तो उसी दिन गिर गया था
जब मैंने अपने विकारों को स्वीकार किया
और प्रायश्चित का मार्ग चुना।

मैं अपने अतीत को नहीं बदल सकता,
लेकिन वर्तमान को खोना भी नहीं चाहता।

शायद तुम ईर्ष्या और मोह के
एक मायाजाल में उलझ रही हो।
मैंने तुम्हें अपने सभी विकारों से परिचित करा दिया है।

अब तुम्हें ही निर्णय लेना है—
उन्हें पोषित करना है
या उनका अंत करना है।

मेरी मानो—
आत्ममंथन करो।

तुम्हें मेरे कंधे की नहीं,
अपने मन के विकारों की मृत्यु ही सहारा देगी।

इसलिए अपनी आशा को यहीं विराम दो—

क्योंकि
तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं।


 ---राजेश बलूनी प्रतिबिम्ब 

Wednesday, August 20, 2025

ख़्वाबों का क्या?














"ओह!" समाज कहता है—

सीधा-सादा जीयो,
ना रोमांच, ना जद्दोजहद,
ना कोई पागलपन लिए हो।

सिर्फ चलो उसी डगर पे
जहाँ सब चलते हैं,
ना सवाल उठाओ,
ना सपनों में पलते हैं।

लेकिन… फिर कैसे जिऊँ
वो ज़िन्दगी,
जहाँ हो जज़्बा,
जहाँ हो बंदगी?

आजकल तो हाल ये है—
सुबह देर से उठता हूँ,
नहा-धोकर ऑफिस भागता हूँ।
डेस्क पर बैठा
वही पुराने काम दोहराता हूँ।

ना नया कोई ख्वाब,
ना रचनात्मकता की आवाज़।
बस जैसे मशीन,
या कहो—खोखली किताब।

अरे! कैसी ये ज़िन्दगी,
ना लक्ष्य, ना उम्मीद,
सूअर-सी खपत,
कीड़े-सी रफ़्तार—


और आख़िर में?
बस ख़त्म—
बिना कोई निशान छोड़े,
बिना कोई चिंगारी जले।

— राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Friday, October 11, 2024

आज उन्मुक्त हो गया......














आज उन्मुक्त हो गया स्वार्थ बंधनों से 

वो झूठ, दगाबाजी और मक्कारी की कहानी 

जिसका कभी मैं हिस्सा था 

आज उन सभी निषेधात्मक विचारों, 

प्रवृतियों और अपमानो के सर्पदंशो से मुक्ति मिल गयी है |

बहुत लांछन लगाए, कितने असत्य वाक्य कहे 

मेरा  विरोध करने के लिए अपने चरित्र का व्यापार भी  किया 

मगर मैं सत्य के मार्ग में अडिग रहा , 

नहीं नहीं मैं अपनी आत्म अनुशंसा नहीं कर रहा हूँ 

मैं तो मुझ पर किये हुए तुम्हारे अत्याचारों का बखान कर रहा हूँ 

मगर संभवतः तुम्हे इस से कोई फर्क न पड़े 

और अब मुझे भी तुमसे कोई सरोकार नहीं 

मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई द्वेष नहीं है, 

मगर अपने लिए पीड़ा है कि मैंने क्यों तुम्हारे दुराचरण का 

समय रहते विरोध नहीं किया , 

क्यों तुम्हारे प्राणघातक 

तुम्हारी आत्ममुग्धता ने 

मेरे अंदर के व्यक्तिव में इतना भय 

उत्पन्न कर लिया था ?

 क्या तुम्हारा उद्देश्य केवल 

मेरे मान और सामान को धत्ता बताना था या फिर 

तुम पहले से ही षड़यंत्र करके आई थी 

खैर अब जो भी हो, 

प्रभु की कृपा से मैं अब तुम्हारे मायाजाल ,

 मोहपाश और घृणित विचारों से स्वतंत्र हो चूका 

तुम्हे सद्बुद्धि मिले न मिले 

मगर मेरे मन को शांति अवश्य मिली है 


- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 




Friday, April 29, 2022

आत्मा का मरण

 











स्वप्न सम्भवतः सबसे पीड़ादायक है

वो आपके अंतरमन को छलनी कर देता है

मैं प्रेम पाश की मृग तृष्णा में अपने अस्तित्व का

विनाश कर रहा हूँ

कब तक यूँ ही संधि करूंगा

क्या मेरा आत्मसम्मान विकृत हो चुका  है , निर्लज्ज  हो चुका है

ये जीवित है भी कि नहीं! 

कब तक अपने स्वप्न की तिलांजलि दूँ

कब तक अपने विचारों को मारूं

मैं अपनी प्रवृति को तुम्हारे साथ नहीं मिला सकता

मैंने बहुत विचार किया ,

लेकिन अब समायोजन करने की पराकाष्ठा हो चुकी है

अब और नहीं , कदापि नहीं

अब या तो विचारों का छरण होगा या फिर आत्मा का मरण होगा 


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '

Friday, November 26, 2021

किंकर्तव्यविमूढ़

मार्ग में चल रहे हैं मगर लक्ष्य क्या है पता नहीं, 

मन की आंखें नेत्रहीन हो गई 

और जो आंखें बची है वो  दिशाहीन  हैं, 

प्रश्न व्यापक हैं मगर  उत्तर लघु हैं, 

खोजते हैं जीवन को मगर स्वयं में कुछ देखते नहीं,

 सारा दिन आलस्य की तन्द्रा में गुज़ारते हैं! 

अब तो कीट और पतंगे भी  हमारा  उपहास करते हैं ,

 क्योंकि हमारा जीवन उनसे भी निकृष्ट हो  गया है! 

उनको मारने वाले कीटनाशक हमारी नसों में घुल चुके हैं , 

भावनाएं तो मानव की वैसे भी विषधर थी 

मगर अब उसमे एक नवरंग चढ़ गया! 

साथ के सहपाठी और सहकर्मी नए-नए आयामों को छू कर आ गए

 और हम वहीँ कूपमंडूक से बैठें हैं ,

 बस कोसना , उलाहना और आलोचना करना आता है! 

परिश्रम करना नहीं आता ,

अपनी परिस्थितियों और असफलताओं  

केवल परिवेदना करना आता हैं , 

स्वयं के हृदय में झांकते भी नहीं , 

मगर दूसरों व्यक्तियों से ईर्ष्या होती है!

कहाँ है वो प्रकाश पुंज जहाँ मन के अँधेरे को 

एक बाती का कण भी प्रज्ज्वलित कर देता है , 

वह कहीं नहीं है मेरे भीतर है , 

बस सोया पड़ा है क्योंकि उसे केवल वाक्पटुता आती है , 

कर्म करना नहीं! 

ठीक है बनो अकर्मण्य, 

रह जाओगे फिर इसी धूसर में  

जिसे सब लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, 

हाँ अपने लिए एक बड़ा सा गड्ढा ज़रूर खोद देना ,

 ताकि लज्जा का अनुभव होने पर 

तुम अपना मुँह तो कहीं छुपा सको, 

तब तक निसंदेह सबकी गालियों का पात्र बने रहे

 क्योंकि तुम्हारी अभद्रता ही तुम्हारे जीवन की पराजय है! 

विफलता का कारण स्वयं तुम हो , 

कोई दूसरा या तीसरा नहीं है !

 रहो ऐसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ 

क्योंकि जीवन में स्पष्टता को तो 

तुमने सम्मिलित होने का अवसर ही नहीं दिया! 

रुग्ण तुम्हारा शरीर नहीं तुम्हारी  मानसिकता है , 

इसको परिवर्तित करो , 

अन्यथा जैसे इतिहास ने कायरों का मान मर्दन किया 

वैसे ही तुम्हारा भी किया जाएगा !

 हालाँकि इसकी सम्भावना ना के सामान है!

 क्योंकि सामर्थ्य कुछ नहीं है तुम में 

और तुम अनदेखा और तिरस्कृत करने के ही योग्य हो


-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Sunday, March 4, 2018

प्रपंच मंडली....



भूलवश समझता रहा कि मेरे पास
शुभचिंतकों का भण्डार है, संभवतः यह
मेरे जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है | कैसे एक व्यक्ति अपनी
तृष्णाओं और आकाँक्षाओं की पूर्ति के साधक खोजता है,
परिस्थितिवश वो व्यक्ति सहृदयता की नौटंकी करके स्वयं को
आपके प्रति आत्मीय सिद्ध करने का प्रयास करता है,
और इन्हे आधुनिक शब्दकोष
में मित्र की संज्ञा दी गई है| मित्र !
अरे कैसे मित्र हैं ये, जो स्वार्थ सिद्धि की चरम पराकाष्ठा को पार
करते हैं| क्या यही है इस समाज का निरर्थक और निर्लज्ज स्वरूप जो मात्र स्वहित
की परिधि तक सीमित है , इनका उद्देश्य सिर्फ सहानुभूति और धन की उगाही है,
यहाँ सामूहिक विचारों का सम्प्रेषण नहीं होता,
अपितु ये अपने बनाये हुए पूर्वाग्रह और
कुविचार आप पर लादते हैं|
ये स्वयं के अनुसार आपके जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं
तथा आपके दृष्टिकोण को नगण्य समझते हैं और
अपने निर्णयों का निरंकुशता से पालन करवाने की
महत्वकांक्षा रखते हैं, नेतृत्व करने की चाह रखते हैं,
परन्तु सहभागिता को अपने पास तक नहीं फटकने देते|
और तो और इतनी ईर्ष्या, इतना दम्भ और इतनी कृतघ्नता है
इनके भीतर कि स्वयं की आवश्यकता होने पर
एक याचक की भांति हाथ फैलाते हैं और आपका समय आने पर
मौन अवस्था और अस्वीकृति की मुद्रा में आ जाते हैं|
वहां अपने आपको असहाय दिखने का छद्म करते हैं|
परन्तु समय का प्रहार बड़ा ही कटु और पीड़ादायक होता है
और यदि यही धूर्तता की प्रवृति विद्यमान रही तो भविष्य में
किसी भी प्रकार की आशा करने वाले अपरिपक्व तथा लोभी
मानसिकता के लोगों के लिए  द्वार बंद हो जाते हैं |
सहयोग़, निष्ठा और समन्वय बहुत ही मूलयवान चरित्र हैं जीवन के,
और इस प्रपंच मंडली तथा अमित्र समूह से इसकी अपेक्षा करना बेमानी है|

-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Tuesday, December 19, 2017

परिचय



समय तुम बहुत तीक्ष्ण और निर्मम हो ,
संभवतः तुमने मेरी दिनचर्या और जीवन में असंख्य दंश दिए हैं,
 और इसका उत्तरदायी मैं स्वयं हूँ ,
अनंतकाल से अज्ञानता की काल कोठरी में मस्तिष्क परतंत्र हो चुका,
स्वतंत्रता क्या होती है इसका तनिक भी भान नहीं था ,
बस  अभिमान की एक  मोटी परत थी जो मानसिकता को भ्रष्ट कर रही थी|
विद्वेष और दम्भ ने चेहरे की त्योरियों को बढ़ा रखा था|
 ज्ञात नहीं कि कौन से गंतव्य की ओर मुड़ना है,  बस अनवरत किसी दिशाहीन यात्रा पर जा रहे हैं ,
संशय का सम्बल लेकर,
मेरा अर्ध ज्ञान तब मेरे व्यक्तित्व की तिलांजलि देता है  जब मैं मौन होकर भी विचलित रहता हूँ ,
ईर्ष्या का आविर्भाव ऐसे हुआ जैसे कोई गर्म चाय के केतली  मेरे केशरहित मुंड पर उड़ेल रहा हो!
कुविचार आया कि कैसे प्रतिक्षण प्रयास किया जाये जीवन की विलासिता को बढ़ाने वाले साधन यंत्रो से लैस होते रहें |
समय व्यतीत अपने समय में होता गया और मैं चिंता की कोठरी में कठोर शीत लहर का प्रहार झेल रहा हूँ ,
ये बयार हवाओं की नहीं अँधेरे की है ,
जीवन के अँधेरे की, निराशा के अँधेरे की!  कैसे पार पाउँगा ,
नैया तो पहले ही खर पतवार के खेतों में उलझ चुकी थी, वहां मरुभूमि ही थी,
कोई हरियाली नहीं थी|  क्यों! परिस्थितियों  तुम क्यों  नीरव अश्रुकण को बहाती हो ,
 आओ तुम भी आओ रणभूमि में बाण चलाने के लिए,   मुझे कोसने के लिए  ,
संभवतः मेरी पीड़ा के मधुर सोपान, कंटकों की क्यारियों में आश्रित है जिन्हे स्वयं मैंने बोया था कभी लालसा,
मद और अति महत्वाकांक्षा का उपधान लेकर!!!!!
विचारों का समागम अब तब होगा जब इस निर्दय शरीर का एक एक टुकड़ा अग्निकुंड में सम्माहित होगा ,
फिर किसी की सहानुभूति की दो बूँद भी मेरी आत्मा के निर्वाण के लिए पर्याप्त होगा ,
तब तक अनायास ही पश्चाताप की वेणी बजायेंगे, नहीं तो मंथन तो होगा ही!!!!

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Thursday, November 30, 2017

वाह रे अहं !



वाह रे अहं ! अंततः तू मेरे व्यक्तित्व का पतन करने में सफल हो ही गया, क्यों आखिर क्यों हुआ ये, संभवतः अति परावलम्बी  मानसिकता ने मेरे लिए विषाक्त सामग्री का काम किया, क्या मित्र , क्या शत्रु, क्या शुभचिंतक और क्या आलोचक , सभी ने अपने अपने चरित्र का अर्ध विश्लेषण किया , सभी पर आत्म अनुशंसा और स्वार्थपरता की मोटी चादर चढ़ चुकी है , क्योंकि सभी सिर्फ अपने जीवन तक ही सीमित है ,

किसी के अंदर भी लोक कल्याण की भावना सिर्फ भाषणों तक सीमित है ,
अपनी अंदर के क्षीण विचारों की समालोचना कोई नहीं करता,
मगर दुसरे के व्यक्तित्व की छीछालेदार करना अब समाज के लिए अब रुचिकर हो गया है ,
मैं भी इस भ्र्ष्ट तंत्र का हिस्सा बन चुका हूँ, क्योंकि मैंने अपने चारों  ओर
अभिमान की एक गहरी रेखा खींच दी है, हाँ मेरा अहंकार दिन प्रतिदिन मुझसे जीत रहा है
और मेरे व्यक्तित्व के सभी सकारात्मक गुणों को दीमक की भांति खा रहा है
विचारधारा अब ये नहीं कि मैंने क्या गलत किया है ,
अवधारणा ये है कि मेरे मन के अंदर कितनी सारी भ्रांतिया मैंने पाली हुई है|
वो इसलिए क्योंकि किसी ने हास्य विनोद में मेरी प्रशंसा की और मुझे ये दम्भ हो गया कि मेरे सामान कोई भी बुद्धिशाली नहीं मगर मैं निश्चित ही भ्रम में था ,
क्योंकि धुरंधरों की कोई कमी नहीं इस संसार में !,
 इसलिए अभिमान का चोला उतारो और सहृदयता की बूटी को जीवन में आत्मसात करो ,
 और ये सिर्फ तुमसे नहीं
 स्वयं से भी कह रहा  हूँ

Friday, October 6, 2017

चक्रव्यूह

आशा धूमिल हुई, क्यों हुई ये ज्ञात नहीं
नवजीवन का छोर जब आरम्भ हुआ तो मन में
कौतुहल था, जिज्ञासा थी, स्वप्न बेला सजाई गयी थी,
प्रारंभिक अवसरों पर उसने मुझे प्रभावित भी किया |
परन्तु ऐसा दृश्य दिखा की वो भी पुरानी परिपाटी पर
चल रहा है , जहाँ मैंने अपने विचारों को जाने से रोक दिया है|
 समस्त संसृति में आपकी माता (जननी) तथा मातृभूमि से
आत्मीय सम्भवतः कोई नहीं, कदाचित कोई नहीं ,
यहाँ आडम्बर का प्रदर्शन होता है, दिवास्वप्न दिखाया जाता है,
खेद है कि ना चाहते हुए भी आपको तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है,
कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ समर्थन करते हैं, कुछ स्थिर अथवा तठस्थ हैं, स्तिथि का
अवलोकन कर रहे हैं| अवसरवादी होना कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि यह
उनकी वस्तुस्तिथि को प्रदर्शित करता है| दृश्य रंगहीन हैं, अपशब्दों की
वर्षा हो रही है अन्य लोगों के प्रति पर स्वयं के लिए इन्हे सिर्फ प्रशंसा चाहिए|
 अचंभित हूँ की किसी की मानसिकता इतनी निम्नस्तर की हो सकती है कि
वे छद्म लोक कल्याण करने की भावना का सम्बल लेते हुए अपने निजी स्वार्थो
की सिद्धि चाहते हैं ! मोहभंग हुआ सभी संबंधों से केवल अपनी जननी(माता) के अतिरिक्त | वो निश्छल है, निष्कपट है और उसका प्रेम और निष्काम भाव से मेरे हर कार्य की सफलता सुनिश्चित हो जाती है | खेद है कि मेरा उग्र और क्रोधित स्वभाव के कारन मैं उसे कभी कभी व्यथित कर देता हूँ
हालाँकि ये किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं, पर समय के उस बिंदु पर मैं विवेकहीन हो जाता हूँ|
परन्तु मेरे अंदर के द्वन्द और क्रोधाग्नि का मैं क्या करूं, षड्यंत्रों का जाल काटते -काटते मेरी
प्रवृति भी पशुओं के भांति हो चुकी है | मेरे व्यवहार और विचार में किसी नरपिशाच का आचरण सम्मिलित हो जाता है| हमारे तथाकथित शुभचिंतक हमारे आस पास बड़ी तन्मयता से अवसर मिलते ही
उलाहना देते हैं| यही कारन है की मैं असभय  हूँ , अशिष्ट हूँ, निडर और आशावादी भी
जिस तरह का व्यवहार होगा उसी तरह के आचरण मेरा भी होगा मैं तत्पर हूँ एक नए चक्रव्यूह को ध्वस्त करने को

Monday, July 3, 2017

पंक्तियाँ टूट रही है














पंक्तियाँ टूट रही है , क्यों टूट रही है ये हमें पता नहीं , मगर टूट रही हैं

संभवतः निद्रा के भवन में स्वप्न अब बोझिल हो चुके हैं ,
कर्मशील न होना एक समस्या है
परन्तु जानते हुए भी सुप्त होना उस से बड़ी विडंबना है ,
मानव  ही  मानवीय मूल्यों  का हनन करता है|
विद्यालय अब विद्या का मंदिर नहीं ,
एक व्यापर मंडल है
जहाँ  नुदान के नाम पर मनमाना शुल्क वसूला जाता है ,
अस्पतालों में सेवा भाव नहीं
बल्कि एक बड़ा बाजार लगाया जाता  है
जहाँ लाश भी ऊंचे दामों पर मिलती हैं ,
एक लीक पर ही सारी व्यवस्था का ढांचा चल रहा है,
स्वहित की लीक ,
महत्वाकांक्षा की लीक,
भ्रष्टतम व्यवस्था की लीक ,
नवीनता और विकास की परिपाटी सिर्फ कागज़ों में सिमटी हुई है

हे असत्य ! अंततः तू विजयी हो ही गया ,
बहुत प्रयत्न किया कि तुझे व्यक्तित्व में सम्माहित न होने दूँ ,
 पर तू हमारे  जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है ,
क्यों आसपास प्रपंच है , असामाजिकता है , निम्न मानसिकता है ,
 कहाँ है वो सत्य का प्रकाश
अरे सत्य का मूल्य कायर नहीं जान सकते ,
हाँ मेरे जैसे कायर , सत्य स्वीकारने
और सत्य बोलने के लिए वीरों सा धैर्य चाहिए ,
सत्य तो वीरों की पूँजी है
मंदिर में शिवजी का पूजन कर रहे हो ये अच्छा है ,
परन्तु शिवजी  की महिमा तभी प्रफुल्लित होगी जब सत्य का पूजन होगा !

परन्तु ऐसा लगता है जैसे ये संसार पाखंड की प्रयोगशाला बन चुका है ,
और इस मशीनी युग में मानवता का मूल्य धीरे धीरे शून्य हो रहा है ,
क्योंकि हमें सिर्फ अर्थशास्त्र की भाषा पसंद है ,
 राजनितिक किर्याकलापों में हमारी अत्यंत आस्था है ,
मगर सामाजिक सरोकार अब सिर्फ घोषणाओं
और क्षद्म धर्मार्थ करने का साधन मात्र है ,
यहाँ कोई भी कार्यालय सिर्फ लाभ देखना चाहता है ,
उनका उद्देश्य सिर्फ बाज़ारवाद
और भौतिकवादी सोच को विकसित करना है !
ममत्व और सहानुभूति की आशा रखना उनसे बेमानी है

आशाएं बुझ रही है क्यों बुझ रही है पता नहीं , मगर बुझ रही हैं

समस्याओं पर वाद विवाद होता है ,
मगर समस्याओं का समाधान नहीं होता ,
विकास का एक पक्ष आकाश के मुहाने पर पहुंच चुका है
और एक हिस्सा अभी भी कूड़े के ढेर में अपना
बचपन और दो बासी रोटियां ढूंढ रहा है

ये असमान अंतर कब भरेगा , कभी भरेगा भी ,
क्या ये सिर्फ मेरी कविता तक ही सिमटा रहेगा ,
या कभी धरातल पर भी आएगा , मुझे ताली नहीं चाहिए ,
और न ही उनके लिए सहानुभूति चाहिए  ,
क्योंकि वो गरीब तुम्हारी सहानुभूति नहीं बल्कि
अपने संघर्ष पर और अपने बाहुबल पर विश्वास रखता है ,
बस उसे उसका अधिकार चाहिए ,
वो रो रहा है , और हम हंस रहे है ,
टीवी पर चुटकुले सुनकर , हाँ चुटकुला ,
अरे हम सबसे बड़े चुटकुले हैं ,
जो उसकी ज़िन्दगी को मज़ाक बना दिया ,
ये मध्यम वर्ग , और निम्न वर्ग सिर्फ विकास के अवसर चाहता है ,
जो उसे नहीं मिलता , मिलता भी है तो छीन  लिया जाता है,
दलित शब्द को जाती का प्रमाण पत्र दे दिया ,
 उसके वास्तविक अर्थ को नहीं समझे ,
दलित दबा कुचला है  सिर्फ हमारी वजह से ,
 लेकिन दलित सिर्फ वो नहीं जो सिर्फ जाति से दलित है ,
दलित वो भी है जो निर्धन है ,
और उसके सारे विकास के अवसरों की तिलाँजलि दी जाती है ,
अपनी ये जातिवादी मानसिकता को त्याग दो

हाँ मैं निराशा की बात कर रहा हैं ,
कोसो मुझे , जितना कोस सकते हो,
पर यदि ज़मीन पर ये सच नहीं है , सच क्या है,
 मैं कहता  था न की आखिर  असत्य जीत गया!
सामान्य  वर्ग जब योग्यता होते हुए भी
विकास के अवसर से वंचित रहता है
तो वो भी एक अत्याचार से कम नहीं है ,
 वो उस जाति के दलित से भी ज़्यादा हताश हो चुका
जब उसे आरक्षण का सर्पदंश लगता है ,
नहीं नहीं मैं आरक्षण विरोधी नहीं हूँ ,
परन्तु मैं समान अवसर का पक्षधर हूँ ,
 मैं सत्य कह रहा हूँ , एक कटु  सत्य  ,
सम्भवतः  इसके  बाद  मेरा  तीव्र  विरोध  होगा  ,
 परन्तु मैं सत्य  से  नहीं डिग  सकता  ,
 मैं कोई महात्मा भी नहीं हूँ ,
परन्तु एक सामान्य नागरिक की भांति विचार रख रहा हूँ

बोलियां चुभ रही है , असत्य वाली बोलियां , चुभेंगी ज़रूर और चुभ रही हैं
पंक्तियाँ टूट रही है , क्यों टूट रही है ये हमें पता नहीं , मगर टूट रही हैं
इच्छाएं फुक  रही हैं , क्यों फुक रही या हमें पता नहीं , मगर फुक रही हैं
चिंताएं बढ़ रही हैं , क्यों बढ़ रही है , सभी को पता है , इसलिए बढ़ रही हैं

Sunday, July 2, 2017

शब्दवृत्त



कितने वर्षों से खोज रहा हूँ मन के अँधेरे को |
कभी दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या में , कभी प्रेम को निरर्थक प्रमाणित करने में ,
कदाचित ये न्यायोचित है मेरे अहम् के लिए परन्तु मेरे व्यक्तित्व के लिए कभी नहीं हो सकता ,
एक गतिरोध उत्पन्न होता है ; कर्मनिष्ठा और छल-कपट के मध्य ,
और इस प्रतिस्पर्धा में किस और मेरा दृष्टिकोण होगा मुझे ज्ञात नहीं है ,
संभवतः मैं विवेकहीन हो गया हूँ , क्योंकि मेरा स्वाभिमान दो खण्डों में विभाजित हो चुका है ,
स्व और अभिमान में | दोनों ने लिए एक विशेष स्थान बना लिया है ,
मेरा स्व अपने समक्ष किसी की नहीं सुनता और अभिमान दूसरों को निकृष्ट सिद्ध करने में प्रयासरत है |
परन्तु हाँ ! इस सबसे एक बात स्पष्ट है की मेरा अंतकाल आने में अब अधिक समय नहीं बचा ,
ये संताप क्यों अधिकृत है प्राणो में !
अरे होगा ही , जब स्वयं मैंने विचारों की शून्यता को अनुभव किया है !
मगर अब नहीं ! कदापि नहीं !
अब नवचेतना आएगी और द्वेष और क्लेश का प्रतिकार करेगी
क्योंकि मैं अब ये समझ चुका हूँ की संगठन की व्यवस्था ही एकमेव मार्ग है एकांत का परिहास करने को |
सत्य और सद्भाव है तभी जीवन की हर गणित सरल है ,
सामानांतर  रेखाएं चाहे कभी आपसे में नहीं मिल सकें पर साथ तो चल रही हैं ,
असंख्य कोण , विचित्र परिमेय , नया आधार , कितने ही आकार हैं जीवन में ,
मगर अंत में सब एक गोलाकार वृत्त में सम्माहित हो जायेगा, जैसे कि मेरा ये शब्दवृत्त......................................

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Monday, May 8, 2017

कृषक-व्यथा...


ठंडी आँच का समंदर क्यों पिछड़  रहा है
क्या दूर से आनेवाली नदी ने अपना रास्ता बदल दिया , बदल ही दिया होगा
क्यों  नहीं बदलेगी वो जब उस पर  बड़ा सा बाँध बना दिया तो क्या किया जा सकता है
कृषक तो  वैसे ही रो रहा है और पराली जलाता  है तो पूरा प्रदेश रोता ,
 अरे वो भी क्या करे क्योंकि  जो क़र्ज़ वो ले रहा है उसको चुकाने के चक्कर मे वो खुद सिधार  जाता है , और छोड़ जाता अपने  बच्चों को  मुआवजा  लेने सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए
, बड़े बाबू कहते हैं , कल आना , आज  मंत्री जी अयांगे तो तुम्हारी अर्ज़ी उनके पास रख देंगे ,
 उसे क्या पता था की बड़े बाबू का कल  5 साल मे आएगा ,
शायद 10 साल भी हो सकते हैं , हो सकता  है कृषक का बेटा खुद
अब अपने अर्थी  की तैयारी कर रहा हो , अरे हो क्या सकता है हो ही रहा है ,
.द्‍यनीय स्थिति हमेशा से ही रही है , उस पर क्यों  भाषण देते हो साहब,
करना है तो कुछ करो , वरना ये आश्वासन के पुलंदे  मत इकठ्ठा  करो ,
हमे जीना होगा तो जी लेंगे , और मरना होगा ,
अरे मरना ही होगा जब कोई विकल्प  ही नहीं छोड़ा आपने ,
लेकिन आप अपनी सियासत को मेरे मौत से उत्पन्न सहानुभूति से चमका देना ,
 अपना तो  स्वाभाव ही है, लोगों  का भला करना ,
 सम्पूर्ण देश को खिलाते हैं  ,
.तो आप भी इसमे से कोई फायदा  ले लो ,
बाकी तो अगर ईश्वर की कृपा होगी तो कहूँगा ,
कि हो सके तो किसान मत बनाना , नेता ही बना देना ,
ना कुछ करना पड़ता है , बस झूठ, मक्कारी और अवसरवादिता  मे डिग्री होनी चाइये
, वरना भ्रष्ट जनता बना देना , जो 500  रूपए और 1
 शराब की बोतल के लिए अपना अस्तित्व और भविष्य दांव पर लगा देती है ,
गरीब जनता की तो मजबूरी है  उन्हें अगर दो रोटी
 का जोई लालच देगा तो वो उसी  प्रतिनिधि को चुनेगा ,
 मगर उन संपन्न और तथाकथित बुद्धिजीवियों के
 मन मस्तिष्क पर के पत्थर पड़े हुए हैं जो इस भ्रष्टतंत्र का हिस्सा बने हुए हैं   ,
रही बात हम किसानो की तो हमारी तो विवशता है साहब
अब विश्वास करना आदत बन चुकी है चाहे बाद में विश्वासघात ही मिले ,
आखिर हमें अपने परिवार को चलाना ,
 शायद आप हम पर अनैतिकता का आरोप लगाएं
लेकिन इसमें हमारा बिलकुल भी वश नहीं है ,
आप सत्ता पर बैठो हो , और ये निश्चित रूप से आपकी ज़िम्मेदारी है ,
मगर आपको हमारे 1000 रुपये  क़्वींटल गेहूं से ज़्यादा अपने 13000 की थाली अच्छी लगती है ,
वो अलग बात है की उस थाली में मेरा भी कुछ तो योगदान होगा ,
खैर , मैं क्यों इतना कह रहा हूँ , चलो मुझे देर हो रही है, जा रहा हूँ बाजार में जेब में कुछ पैसे उधर लिए हैं पडोसी से ताकि ज़हर की एक शीशी खरीद सकूँ ..........................


- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Thursday, October 27, 2016

आकाश तू एकाकी हो गया आज!!!!!!

आकाश तू एकाकी हो गया आज  !!!
क्योंकि धूप के छीटों  को समेटता  है बादल जो बरसना तो दूर बस उमस की फुहार लाता है और चाँद है कि अंधेरे पी रहा है  क्योंकि  सड़क पर धूल के साथ साथ खून से सने कपड़े मिले हैं, जहाँ आदमी आदमी को मरता छोड़कर अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त है जहाँ मानवता कटोरा लेकर भीख मांगती है लेकिन उसे दया तो छोडो कोई दृष्टि भी नहीं मिलती | .एक अजीब सी होड़ लगी हुई है जिसमे अपने आपको श्रेष्ठतम कहलाने हेतु  
जो भी संभव होगा वो किया जाएगा, फिर चाहे वो अनुचित हो या 
अन्याय संगत हो, पीड़ा तो होती है मगर उस पीड़ा को इसलिए दबा दिया जाता है 
क्योंकि पैसे की खनक और दंभ का आईना सामने आ जाता है मौसम भी धू धू कर के जल रहा है! 
अरे सूर्य के ताप से नहीं ईर्ष्या के प्रचंड महाताप से, 
यह अनावश्यक ही जीवन की गति को धीमी कर रहा है !! 
क्योंकि मुझे तेज़ चलना है फिर भले ही मेरे पाँव तले कोई भी कुचल जाये , 
मुझे कोई परवाह नहीं , 
जब वैसे ही जंगल राज है तो क्या औचित्य है नैतिकता और सत्य निष्ठा का !!
वो तो मात्र भाषण की प्रतिलिपि के तौर पर प्रयोग होती है ! 
और भाषण और उपदेश ख़त्म होने पर किसी कूड़े के ढेर में फेंक दी जाती है !!
हाँ कूड़े का ही ढेर हैं सिर्फ सड़क पर नहीं ,
लोगों के मन मस्तिष्क पर भी है ,
और उन लोगों में सर्वप्रथम पंक्ति में मैं खड़ा हूँ ,
क्योंकि मुझे अपना व्यापार बढ़ाने के लिए प्रतिदिन सौ असत्य बोलने पड़ते हैं ! 
और असत्य हमारी जीवनशैली बन चुकी है !! 
असत्य जीवनशैली ही नहीं हमारा व्यक्तित्व, वातावरण और आचरण भी हो चुका है !! 
अनंत संभावनाएं खड़ी हैं और मैं उनसे एक अच्छा अवसर पाना चाहता हूँ मगर ये बेशर्म आदर्शवादिता रोज़ मेरे कान खाती है !! इस से मुझे मुक्ति चाहिए कोई दिला सकता है ! 
अवश्य दिलाएगा कोई न कोई, क्योंकि यहाँ नृशंसता, नपुंसकता, पापी , निर्लज्जता और निर्दयता  के कई महारथी हैं जिनका जीवन स्वर्ण की भांति चमक रहा है !! 
भले ही उनके आसपास सिद्धांतों का अपहरण हो !! 
किन्तु उनके माथे पर लेशमात्र भी चिंता का  संबल नहीं पड़ता !! 
खेले खाये व्यक्ति हैं ! अपच भी नहीं होता इतनी सारी सम्पति हड़पने पर| धन्य है ऐसे व्यक्ति , उनसे बड़े धन्य हम  है जो उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रहे हैं !! 
सत्य और नैतिकता का क्या  है वो  वैसे भी जीवित रहेंगी बड़ी बड़ी पोथियों और किताबों में , विद्यालयों में , नारों में , भाषणों में ! बस यार आचरण और जीवन में उसको लाने को मत बोलना, क्योंकि ये सफलता के आड़े बहुत आती है !! 
चलो अब चलते हैं ज़रा अपनी धूर्तता से सफलता प्राप्त करने को!!


- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Saturday, November 14, 2015

समाप्ति की ओर




हे युग मरीचिका तुम कहाँ हो,संभवतःयहीं हो
जीवन के जिस कालखंड से स्वयं को देखा है तब से एक दौड़ लगी हुई है
अनवरत,कुछ प्राप्त करने  या सब कुछ त्यागने को, ज्ञात नहीं है ,
परिस्थिति बड़ी असमंजस की है,
आख़िर क्या चाहिए मुझे ये प्रश्न अभी तक अनुतरित है,
आदर्श समाज कहता है कि धैर्य रखो,धैर्य एक सागर है,
मगर लगता धैर्य सागर नहीं एक बाँध है,
जो पता नहीं किस पल एक छोटी सी लहर से लड़खड़ा जाएगा,
निस्तेज है वातावरण,
सभी ध्रुवों  से विरोध की ध्वनि मुखर है,
क्या करूँ,सुनता हूँ तो समय व्यर्थ होता है,और
ना सुनू तो व्यक्तित्व के दोष में यथास्थिति बनी रहती है  ,
ऐसे लगता है सारे बाण सूक्ष्म होकर सुईं के रूप मे मुझे छेद रहे हैं,
और पीड़ा  दिखाने का किंचित भी समय नहीं है मेरे पास,
इसलिए नहीं कि मैं व्यस्त हूँ बल्कि इसलिए कि मेरे पास समय का अभाव है,
जो उस समय नहीं था जब मैने इसे व्यर्थ किया,
धन वैभव के लिए भागता हूँ ,
प्रतिष्ठा के लिए दौड़ा,चापलूसी करने का भी मन किया मगर कर नहीं पाया ,
शायद दंभ की मात्रा बहुत थी,या फिर स्वाभिमान था,
मगर अब मेरा आदर्शवाद किसी  गली के  खंडहर् मे सो रहा है,
कोई नहीं सुनना चाहता भाई यहाँ पर!
यहाँ एक विचित्र सी गति की प्रतिस्पर्धा है ,और वो गति किसी नैतिकता को नहीं मानती,
किसी चरित्र को नहीं मानती बस इसे कुछ सिक्को की झंकार
और मुद्राओं का भंडार चाहिए इसके अतिरिक्त मानवता का कोई परिदृश्य यहाँ नहीं दिखता,
और मैं भी इस क्रूर मायाजाल के अधीन हो गया हूँ,
इतना विकृत कि दर्पण मे अपने मुखमंडल को देखने पर भी घृणा होती है,
समाप्ति की ओर है ये यात्रा,
और एक अनायास निरंतर गति से चलता है जीवन-रथ,
जीवन के पहियों पर भौतिकवादी मानसिकता का आवरण है,
ताकि ये सुख समृद्धि वाला छदम जीवन अमृत समान हो,
हां वहीं अमृत जिसे सोमरस कहते हैं,
जिस के सेवन करने पर मैं एक सम्राट की भाँति आचरण करता हूँ,
सम्राट!!!! हा हा हा ,एक निरंकुश,दुर्बल,और कुंठाग्रस्त सम्राट,
यही लड़खड़ाती व्यवस्था है अब इसी पर चलना,
वैसे तुम्हे चलना होगा तो बता देना ,
मैं हमेशा से तत्पर हूँ , यहाँ तुम्हे निर्देश देने को और प्रशिक्षित करने को !  

--राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'      


Tuesday, March 3, 2015

चक्रव्यूह नव-अभिमन्यु का


सोच के उस दायरे मे सारे प्रयत्न विफल हैं शांति के जब कोई विभीषण अपने ही घर का भेद खोलता है,ये घातक आस्था उस(विभीषण) पर इस तरह हावी है कि उसे अपना अपमान स्वीकार  है मगर तुम्हारा सम्मान कतई स्वीकार नहीं,  इस ओछी विघटन करने की राजनीति का शीघ्र ही उन्मूलन होगा और ऐसा होगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थान भी पर्याप्त नहीं होगा तुम्हे अपनी 
कुटिल मुखाकृति छुपाने को !! 


षडयंत्र रचते हैं और पकड़े जाने पर निर्लज़्ज़ता से अपनी बात का औचित्य सिद्ध करते हैं, 
वीभत्सता तथा निम्नता की सारी सीमाएं लाँघ देते है, 
मगर उनके मस्तिष्क मे फिर भी पश्चाताप की एक भी रेखा नहीं होती 

खेद है कि ऐसे तथाकथित मित्रों और सम्बंधियों से अच्छे तो हमारे शत्रु हैं , 
कम से कम हमे उनके वार का तो पता रहता है,
आँखों मे झूठी संवेदना,असत्य सांत्वना,हित करने का मिथ्या मण्डन तो कोई इनसे सीखे, 
क्षुब्ध हूँ,और अशांत भी मगर,अब सत्य का उद्घोष होकर रहेगा, अगर तुम कपट,छल के ज्ञाता हो
तो मैं तुम्हारे लिये विध्वंसक हूँ ,एक ऐसा विध्वंसक जो तुम्हे मूल से उखाड़ फेंकेगा ,
और उसके बाद तुम्हे अपनी धारणा पर बहुत पश्चाताप होगा, 

ये तुम्हारे भीतराघात और आघात पर मेरा विस्फोटक प्रतिघात होगा! 
तुम्हारे इस कुचक्र ,स्वार्थ पोषित चक्रव्यूह को मैं तोड़ कर रहूँगा ! हाँ मैं अर्जुन नहीं हूँ 
लेकिन मैं नव-अभिमन्यु हूँ जिसे तुम अबोध समझकर बड़ी तन्मयता और सरलता से ले रहे हो ये नव अभिमन्यु अब तुम्हारे चक्रव्यूह को तोड़कर भस्म करके ,फिर उस से पार पाने मे भी समर्थ है !  और मैं विनाशक भी हूँ जो तुम्हारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को समूल नष्ट करने का शौर्य और योग्यता अपने पास रखता हूँ !!! 

-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 




     


Sunday, February 22, 2015

कितने दंश??????

प्रातः काल मे आलस्य का आवरण लिये तनिक उठा शरीर
घोर निंद्रा और अपरिष्कृत विश्राम शय्या
उस पर घर मे तत्काल ही उलाहना भरे शब्द, दोषारोपण
जीवन की ये दिनचर्या जैसे  मुझमे प्रगाढ़  हो चुकी है 

संभवतः मैने भूतकाल मे ऐसे निर्णय लिये हों जिस से
कि मेरे कारण मेरे परिवार को क्षति और दुख पहुंचा हो
इसलिये मुझे इस प्रकार के विषबाण लगते हैं

मुखाकृति जब भी प्रसन्नता  को धारण करना चाहती   है
तब ही ना जानने कितने सारे विरोध, द्वेषपूर्ण संवाद,
प्रवंचना, मिथ्या उपदेश, क्रोधित विचार, असंयम वाणी,
अपशब्दों का अंबार  मुझ पर बरसते हैं
और मेरा व्यक्तित्व-हनन होता रहता है

आखिर कब तक मैं इतने सारे  दंश को संमाहित करने की सहिष्णुता लाऊँ? 
क्या मेरा व्यक्तित्व केवल एक ही स्थान पर सिमट गया है? , क्या मुझे अधिकार नहीं
कि मैं अपना  जीवन स्वच्छन्द विचारधारा के साथ व्यतीत करूं?,
संभवतः नहीं , क्योंकि मैं भी जानता हूँ कि मुझसे संबद्ध कई व्यक्ति और मत हैं
और मैं उनका अनादर नहीं कर सकता, अरे नहीं ! मैं व्यक्तिवाद मे तनिक भी
सम्मिलित नहीं हूँ, परंतु यदि मैं अपने अंतर्मन को इसी तरह सिकुड़ता रखूंगा
तो संशयपूर्ण, विकल्प-हीन और कुंठाग्रस्त अवश्य हो जाउंगा 

मुझे ज्ञात  है कि यह निश्चित ही एक विचित्र संवाद है दूसरों के लिये , पर मुझे
अपने स्पष्ट स्वरूप की अभी तक आवश्यकता है , जो संभवतः इस संसार के किसी  भी कोने मे विद्यमान नहीं है         


 राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब

  


Wednesday, February 18, 2015

जन्म का ये दिवस भी......

जन्म का ये दिवस भी ,
स्मरण रहेगा मुझे भी 

संवाद स्थापित नहीं हुआ 
जो धन है अर्जित वही हुआ 
ये शृंखला है त्रास की 
बूंदें लगी मधुमास सी 
है सहस्र साथी साथ के
पर कहीं एकांत की छाया मे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

आकांक्षाएं शोषित हुई 
प्रतिकार को प्रेरित हुई 
वनवास फिर श्री राम गये 
रावण सी सृष्टि दिख रही  
भगत जी शिवधाम गये 
बस उसी अर्ध स्वप्न की बेला मे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

ये रश्मियां असंख्य है 
पर सूर्य कब तक दिव्य है 
ये सदियों का संताप है 
ध्वनि तेज़ करना पाप है 
प्रबुद्ध सब चुपचाप हैं 
ये राक्षसी पदचाप है 
मैं स्वयंभू नहीं भिन्‍न इससे 
कर रहा हूँ आत्म मंथन
किसी बीहड़ पथ के तीरे 

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

नीरस है रहती हर दिशा
मैं स्वप्न दृष्टा कब रहा 
जो स्नेह स्वाति जल रही 
उनका ना मुझमे कुछ रहा 
क्या शेष जीवन रह गया 
अब शीत-श्वासें थक रही 
जब ग्रीष्म क्रोधित मन हुआ   
मन के तिमिर मे खोजकर  
कुछ नव-विधा प्रकाश मैने 
अब जा रहा हूँ रिक्त सा
इस वर्षफल को छोडकर

जन्म का ये दिवस भी 
स्मरण रहेगा मुझे भी 

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'   

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

बड़ी तन्मयता से देखा था तुमने मुझे, और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि— आख़िर ये क्या है? किस पल तुम्हें लगा कि मेरा कंधा तुम्हारे सिर ...