Friday, October 11, 2024

आज उन्मुक्त हो गया......














आज उन्मुक्त हो गया स्वार्थ बंधनों से 

वो झूठ, दगाबाजी और मक्कारी की कहानी 

जिसका कभी मैं हिस्सा था 

आज उन सभी निषेधात्मक विचारों, 

प्रवृतियों और अपमानो के सर्पदंशो से मुक्ति मिल गयी है |

बहुत लांछन लगाए, कितने असत्य वाक्य कहे 

मेरा  विरोध करने के लिए अपने चरित्र का व्यापार भी  किया 

मगर मैं सत्य के मार्ग में अडिग रहा , 

नहीं नहीं मैं अपनी आत्म अनुशंसा नहीं कर रहा हूँ 

मैं तो मुझ पर किये हुए तुम्हारे अत्याचारों का बखान कर रहा हूँ 

मगर संभवतः तुम्हे इस से कोई फर्क न पड़े 

और अब मुझे भी तुमसे कोई सरोकार नहीं 

मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई द्वेष नहीं है, 

मगर अपने लिए पीड़ा है कि मैंने क्यों तुम्हारे दुराचरण का 

समय रहते विरोध नहीं किया , 

क्यों तुम्हारे प्राणघातक 

तुम्हारी आत्ममुग्धता ने 

मेरे अंदर के व्यक्तिव में इतना भय 

उत्पन्न कर लिया था ?

 क्या तुम्हारा उद्देश्य केवल 

मेरे मान और सामान को धत्ता बताना था या फिर 

तुम पहले से ही षड़यंत्र करके आई थी 

खैर अब जो भी हो, 

प्रभु की कृपा से मैं अब तुम्हारे मायाजाल ,

 मोहपाश और घृणित विचारों से स्वतंत्र हो चूका 

तुम्हे सद्बुद्धि मिले न मिले 

मगर मेरे मन को शांति अवश्य मिली है 


- राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 




Friday, April 29, 2022

आत्मा का मरण

 











स्वप्न सम्भवतः सबसे पीड़ादायक है

वो आपके अंतरमन को छलनी कर देता है

मैं प्रेम पाश की मृग तृष्णा में अपने अस्तित्व का

विनाश कर रहा हूँ

कब तक यूँ ही संधि करूंगा

क्या मेरा आत्मसम्मान विकृत हो चुका  है , निर्लज्ज  हो चुका है

ये जीवित है भी कि नहीं! 

कब तक अपने स्वप्न की तिलांजलि दूँ

कब तक अपने विचारों को मारूं

मैं अपनी प्रवृति को तुम्हारे साथ नहीं मिला सकता

मैंने बहुत विचार किया ,

लेकिन अब समायोजन करने की पराकाष्ठा हो चुकी है

अब और नहीं , कदापि नहीं

अब या तो विचारों का छरण होगा या फिर आत्मा का मरण होगा 


राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब '

Friday, November 26, 2021

किंकर्तव्यविमूढ़

मार्ग में चल रहे हैं मगर लक्ष्य क्या है पता नहीं, 

मन की आंखें नेत्रहीन हो गई 

और जो आंखें बची है वो  दिशाहीन  हैं, 

प्रश्न व्यापक हैं मगर  उत्तर लघु हैं, 

खोजते हैं जीवन को मगर स्वयं में कुछ देखते नहीं,

 सारा दिन आलस्य की तन्द्रा में गुज़ारते हैं! 

अब तो कीट और पतंगे भी  हमारा  उपहास करते हैं ,

 क्योंकि हमारा जीवन उनसे भी निकृष्ट हो  गया है! 

उनको मारने वाले कीटनाशक हमारी नसों में घुल चुके हैं , 

भावनाएं तो मानव की वैसे भी विषधर थी 

मगर अब उसमे एक नवरंग चढ़ गया! 

साथ के सहपाठी और सहकर्मी नए-नए आयामों को छू कर आ गए

 और हम वहीँ कूपमंडूक से बैठें हैं ,

 बस कोसना , उलाहना और आलोचना करना आता है! 

परिश्रम करना नहीं आता ,

अपनी परिस्थितियों और असफलताओं  

केवल परिवेदना करना आता हैं , 

स्वयं के हृदय में झांकते भी नहीं , 

मगर दूसरों व्यक्तियों से ईर्ष्या होती है!

कहाँ है वो प्रकाश पुंज जहाँ मन के अँधेरे को 

एक बाती का कण भी प्रज्ज्वलित कर देता है , 

वह कहीं नहीं है मेरे भीतर है , 

बस सोया पड़ा है क्योंकि उसे केवल वाक्पटुता आती है , 

कर्म करना नहीं! 

ठीक है बनो अकर्मण्य, 

रह जाओगे फिर इसी धूसर में  

जिसे सब लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, 

हाँ अपने लिए एक बड़ा सा गड्ढा ज़रूर खोद देना ,

 ताकि लज्जा का अनुभव होने पर 

तुम अपना मुँह तो कहीं छुपा सको, 

तब तक निसंदेह सबकी गालियों का पात्र बने रहे

 क्योंकि तुम्हारी अभद्रता ही तुम्हारे जीवन की पराजय है! 

विफलता का कारण स्वयं तुम हो , 

कोई दूसरा या तीसरा नहीं है !

 रहो ऐसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ 

क्योंकि जीवन में स्पष्टता को तो 

तुमने सम्मिलित होने का अवसर ही नहीं दिया! 

रुग्ण तुम्हारा शरीर नहीं तुम्हारी  मानसिकता है , 

इसको परिवर्तित करो , 

अन्यथा जैसे इतिहास ने कायरों का मान मर्दन किया 

वैसे ही तुम्हारा भी किया जाएगा !

 हालाँकि इसकी सम्भावना ना के सामान है!

 क्योंकि सामर्थ्य कुछ नहीं है तुम में 

और तुम अनदेखा और तिरस्कृत करने के ही योग्य हो


-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'


Sunday, March 4, 2018

प्रपंच मंडली....



भूलवश समझता रहा कि मेरे पास
शुभचिंतकों का भण्डार है, संभवतः यह
मेरे जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है | कैसे एक व्यक्ति अपनी
तृष्णाओं और आकाँक्षाओं की पूर्ति के साधक खोजता है,
परिस्थितिवश वो व्यक्ति सहृदयता की नौटंकी करके स्वयं को
आपके प्रति आत्मीय सिद्ध करने का प्रयास करता है,
और इन्हे आधुनिक शब्दकोष
में मित्र की संज्ञा दी गई है| मित्र !
अरे कैसे मित्र हैं ये, जो स्वार्थ सिद्धि की चरम पराकाष्ठा को पार
करते हैं| क्या यही है इस समाज का निरर्थक और निर्लज्ज स्वरूप जो मात्र स्वहित
की परिधि तक सीमित है , इनका उद्देश्य सिर्फ सहानुभूति और धन की उगाही है,
यहाँ सामूहिक विचारों का सम्प्रेषण नहीं होता,
अपितु ये अपने बनाये हुए पूर्वाग्रह और
कुविचार आप पर लादते हैं|
ये स्वयं के अनुसार आपके जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं
तथा आपके दृष्टिकोण को नगण्य समझते हैं और
अपने निर्णयों का निरंकुशता से पालन करवाने की
महत्वकांक्षा रखते हैं, नेतृत्व करने की चाह रखते हैं,
परन्तु सहभागिता को अपने पास तक नहीं फटकने देते|
और तो और इतनी ईर्ष्या, इतना दम्भ और इतनी कृतघ्नता है
इनके भीतर कि स्वयं की आवश्यकता होने पर
एक याचक की भांति हाथ फैलाते हैं और आपका समय आने पर
मौन अवस्था और अस्वीकृति की मुद्रा में आ जाते हैं|
वहां अपने आपको असहाय दिखने का छद्म करते हैं|
परन्तु समय का प्रहार बड़ा ही कटु और पीड़ादायक होता है
और यदि यही धूर्तता की प्रवृति विद्यमान रही तो भविष्य में
किसी भी प्रकार की आशा करने वाले अपरिपक्व तथा लोभी
मानसिकता के लोगों के लिए  द्वार बंद हो जाते हैं |
सहयोग़, निष्ठा और समन्वय बहुत ही मूलयवान चरित्र हैं जीवन के,
और इस प्रपंच मंडली तथा अमित्र समूह से इसकी अपेक्षा करना बेमानी है|

-राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब'

Tuesday, December 19, 2017

परिचय



समय तुम बहुत तीक्ष्ण और निर्मम हो ,
संभवतः तुमने मेरी दिनचर्या और जीवन में असंख्य दंश दिए हैं,
 और इसका उत्तरदायी मैं स्वयं हूँ ,
अनंतकाल से अज्ञानता की काल कोठरी में मस्तिष्क परतंत्र हो चुका,
स्वतंत्रता क्या होती है इसका तनिक भी भान नहीं था ,
बस  अभिमान की एक  मोटी परत थी जो मानसिकता को भ्रष्ट कर रही थी|
विद्वेष और दम्भ ने चेहरे की त्योरियों को बढ़ा रखा था|
 ज्ञात नहीं कि कौन से गंतव्य की ओर मुड़ना है,  बस अनवरत किसी दिशाहीन यात्रा पर जा रहे हैं ,
संशय का सम्बल लेकर,
मेरा अर्ध ज्ञान तब मेरे व्यक्तित्व की तिलांजलि देता है  जब मैं मौन होकर भी विचलित रहता हूँ ,
ईर्ष्या का आविर्भाव ऐसे हुआ जैसे कोई गर्म चाय के केतली  मेरे केशरहित मुंड पर उड़ेल रहा हो!
कुविचार आया कि कैसे प्रतिक्षण प्रयास किया जाये जीवन की विलासिता को बढ़ाने वाले साधन यंत्रो से लैस होते रहें |
समय व्यतीत अपने समय में होता गया और मैं चिंता की कोठरी में कठोर शीत लहर का प्रहार झेल रहा हूँ ,
ये बयार हवाओं की नहीं अँधेरे की है ,
जीवन के अँधेरे की, निराशा के अँधेरे की!  कैसे पार पाउँगा ,
नैया तो पहले ही खर पतवार के खेतों में उलझ चुकी थी, वहां मरुभूमि ही थी,
कोई हरियाली नहीं थी|  क्यों! परिस्थितियों  तुम क्यों  नीरव अश्रुकण को बहाती हो ,
 आओ तुम भी आओ रणभूमि में बाण चलाने के लिए,   मुझे कोसने के लिए  ,
संभवतः मेरी पीड़ा के मधुर सोपान, कंटकों की क्यारियों में आश्रित है जिन्हे स्वयं मैंने बोया था कभी लालसा,
मद और अति महत्वाकांक्षा का उपधान लेकर!!!!!
विचारों का समागम अब तब होगा जब इस निर्दय शरीर का एक एक टुकड़ा अग्निकुंड में सम्माहित होगा ,
फिर किसी की सहानुभूति की दो बूँद भी मेरी आत्मा के निर्वाण के लिए पर्याप्त होगा ,
तब तक अनायास ही पश्चाताप की वेणी बजायेंगे, नहीं तो मंथन तो होगा ही!!!!

राजेश बलूनी 'प्रतिबिम्ब' 

Thursday, November 30, 2017

वाह रे अहं !



वाह रे अहं ! अंततः तू मेरे व्यक्तित्व का पतन करने में सफल हो ही गया, क्यों आखिर क्यों हुआ ये, संभवतः अति परावलम्बी  मानसिकता ने मेरे लिए विषाक्त सामग्री का काम किया, क्या मित्र , क्या शत्रु, क्या शुभचिंतक और क्या आलोचक , सभी ने अपने अपने चरित्र का अर्ध विश्लेषण किया , सभी पर आत्म अनुशंसा और स्वार्थपरता की मोटी चादर चढ़ चुकी है , क्योंकि सभी सिर्फ अपने जीवन तक ही सीमित है ,

किसी के अंदर भी लोक कल्याण की भावना सिर्फ भाषणों तक सीमित है ,
अपनी अंदर के क्षीण विचारों की समालोचना कोई नहीं करता,
मगर दुसरे के व्यक्तित्व की छीछालेदार करना अब समाज के लिए अब रुचिकर हो गया है ,
मैं भी इस भ्र्ष्ट तंत्र का हिस्सा बन चुका हूँ, क्योंकि मैंने अपने चारों  ओर
अभिमान की एक गहरी रेखा खींच दी है, हाँ मेरा अहंकार दिन प्रतिदिन मुझसे जीत रहा है
और मेरे व्यक्तित्व के सभी सकारात्मक गुणों को दीमक की भांति खा रहा है
विचारधारा अब ये नहीं कि मैंने क्या गलत किया है ,
अवधारणा ये है कि मेरे मन के अंदर कितनी सारी भ्रांतिया मैंने पाली हुई है|
वो इसलिए क्योंकि किसी ने हास्य विनोद में मेरी प्रशंसा की और मुझे ये दम्भ हो गया कि मेरे सामान कोई भी बुद्धिशाली नहीं मगर मैं निश्चित ही भ्रम में था ,
क्योंकि धुरंधरों की कोई कमी नहीं इस संसार में !,
 इसलिए अभिमान का चोला उतारो और सहृदयता की बूटी को जीवन में आत्मसात करो ,
 और ये सिर्फ तुमसे नहीं
 स्वयं से भी कह रहा  हूँ

Friday, October 6, 2017

चक्रव्यूह

आशा धूमिल हुई, क्यों हुई ये ज्ञात नहीं
नवजीवन का छोर जब आरम्भ हुआ तो मन में
कौतुहल था, जिज्ञासा थी, स्वप्न बेला सजाई गयी थी,
प्रारंभिक अवसरों पर उसने मुझे प्रभावित भी किया |
परन्तु ऐसा दृश्य दिखा की वो भी पुरानी परिपाटी पर
चल रहा है , जहाँ मैंने अपने विचारों को जाने से रोक दिया है|
 समस्त संसृति में आपकी माता (जननी) तथा मातृभूमि से
आत्मीय सम्भवतः कोई नहीं, कदाचित कोई नहीं ,
यहाँ आडम्बर का प्रदर्शन होता है, दिवास्वप्न दिखाया जाता है,
खेद है कि ना चाहते हुए भी आपको तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है,
कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ समर्थन करते हैं, कुछ स्थिर अथवा तठस्थ हैं, स्तिथि का
अवलोकन कर रहे हैं| अवसरवादी होना कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि यह
उनकी वस्तुस्तिथि को प्रदर्शित करता है| दृश्य रंगहीन हैं, अपशब्दों की
वर्षा हो रही है अन्य लोगों के प्रति पर स्वयं के लिए इन्हे सिर्फ प्रशंसा चाहिए|
 अचंभित हूँ की किसी की मानसिकता इतनी निम्नस्तर की हो सकती है कि
वे छद्म लोक कल्याण करने की भावना का सम्बल लेते हुए अपने निजी स्वार्थो
की सिद्धि चाहते हैं ! मोहभंग हुआ सभी संबंधों से केवल अपनी जननी(माता) के अतिरिक्त | वो निश्छल है, निष्कपट है और उसका प्रेम और निष्काम भाव से मेरे हर कार्य की सफलता सुनिश्चित हो जाती है | खेद है कि मेरा उग्र और क्रोधित स्वभाव के कारन मैं उसे कभी कभी व्यथित कर देता हूँ
हालाँकि ये किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं, पर समय के उस बिंदु पर मैं विवेकहीन हो जाता हूँ|
परन्तु मेरे अंदर के द्वन्द और क्रोधाग्नि का मैं क्या करूं, षड्यंत्रों का जाल काटते -काटते मेरी
प्रवृति भी पशुओं के भांति हो चुकी है | मेरे व्यवहार और विचार में किसी नरपिशाच का आचरण सम्मिलित हो जाता है| हमारे तथाकथित शुभचिंतक हमारे आस पास बड़ी तन्मयता से अवसर मिलते ही
उलाहना देते हैं| यही कारन है की मैं असभय  हूँ , अशिष्ट हूँ, निडर और आशावादी भी
जिस तरह का व्यवहार होगा उसी तरह के आचरण मेरा भी होगा मैं तत्पर हूँ एक नए चक्रव्यूह को ध्वस्त करने को

तुम्हारा हो भी नहीं रहा हूँ मैं

बड़ी तन्मयता से देखा था तुमने मुझे, और मैं कुछ सकुचाते हुए सोच रहा था कि— आख़िर ये क्या है? किस पल तुम्हें लगा कि मेरा कंधा तुम्हारे सिर ...